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वसीयत का Probate क्या है और 2026 में क्या बदल गया?

मुंबई में पिता का फ्लैट है। वसीयत थी। लेकिन हाउसिंग सोसाइटी कह रही है — "बिना Probate के नाम नहीं बदलेगा।" दिसंबर 2025 में तो Probate की अनिवार्यता खत्म हो गई थी — फिर यह क्यों माँग रहे हैं?

यह स्थिति अभी बहुत आम है। आइए समझते हैं कि Probate का मामला 2026 में कहाँ खड़ा है।

Probate क्या होता है?

Probate एक न्यायिक आदेश है जो दीवानी न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा जारी किया जाता है। यह प्रमाणित करता है कि:

  1. प्रस्तुत वसीयत असली है (Genuine)
  2. वसीयतकर्ता ने उसे स्वस्थ मन और स्वेच्छा से बनाया था

Probate मिलने के बाद निष्पादक (Executor) को संपत्ति वितरित करने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।

दिसंबर 2025 में क्या बदला?

20 दिसंबर 2025 को संसद ने निरसन और संशोधन अधिनियम, 2025 पारित किया। इसके तहत भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 213 को पूरी तरह निरस्त कर दिया गया।

पहले की स्थिति (दिसंबर 2025 से पहले):

पूर्व प्रेसीडेंसी शहरों — मुंबई, कोलकाता और चेन्नई — में हिंदुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों और पारसियों की वसीयत के लिए Probate कानूनी रूप से अनिवार्य था। बिना Probate के संपत्ति हस्तांतरण संभव नहीं था।

अब की स्थिति (2026):

पूरे भारत में Probate स्वैच्छिक (Optional) हो गया है। कोई भी भौगोलिक या धार्मिक बाध्यता नहीं है।

लेकिन व्यवहार में अभी भी Probate क्यों माँगते हैं?

कानून बदल गया, लेकिन संस्थाओं की आदत नहीं बदली।

ये संस्थाएं अभी भी Probate माँग सकती हैं:

  • हाउसिंग सोसाइटी — अपनी देनदारी से बचने के लिए
  • बैंक और NBFCs — आंतरिक compliance नीति के कारण
  • म्यूचुअल फंड हाउस — पुरानी प्रक्रिया अभी अपडेट नहीं हुई
  • Sub-Registrar — यदि संपत्ति का मूल्य बड़ा हो

कानूनी रूप से वे Probate नहीं माँग सकते, लेकिन व्यवहार में माँगते हैं। यदि विवाद की आशंका न हो, तो आप उन्हें कानूनी नोटिस देकर आगे बढ़ सकते हैं — या फिर स्वैच्छिक Probate लेकर झगड़े से बच सकते हैं।

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Probate की प्रक्रिया (चरण-दर-चरण)

चरण 1: सक्षम न्यायालय का चुनाव

  • यदि संपत्ति का मूल्य कम है — जिला न्यायालय
  • अचल संपत्ति के लिए — उस राज्य का उच्च न्यायालय (High Court)

चरण 2: याचिका दाखिल करें

वसीयत की मूल प्रति के साथ दीवानी याचिका दाखिल करें। इसमें शामिल करें:

  • मृत्यु प्रमाण पत्र
  • वसीयतकर्ता और निष्पादक का विवरण
  • संपत्तियों का मूल्यांकन
  • सभी कानूनी वारिसों की सूची

चरण 3: न्यायालय की जांच और नोटिस

न्यायालय वसीयत की प्रामाणिकता की जांच करता है:

  • वसीयत के साक्षियों की जांच
  • अखबारों में सार्वजनिक नोटिस (Citations) प्रकाशित
  • सभी कानूनी वारिसों को नोटिस

चरण 4: आपत्ति अवधि

कोई भी पक्ष 30-45 दिनों के भीतर आपत्ति दर्ज कर सकता है।

चरण 5: Probate आदेश

यदि कोई आपत्ति न हो, तो न्यायालय Probate Grant जारी करता है।

समयसीमा: 6 से 18 महीने (यदि कोई आपत्ति न हो)

Probate की कोर्ट फीस

Probate के लिए कोर्ट फीस संपत्ति के मूल्य पर आधारित होती है और राज्यवार अलग होती है:

राज्य कोर्ट फीस
दिल्ली कुल संपत्ति मूल्य का 2% (अधिकतम ₹75,000)
महाराष्ट्र स्लैब-आधारित — ₹500 से ₹7,500 तक
पश्चिम बंगाल संपत्ति मूल्य का ~2-3%
तमिलनाडु राज्य न्यायालय शुल्क अधिनियम के अनुसार

वकील की फीस अलग से होगी — एक अनुभवी वकील ₹20,000 से ₹1,50,000 तक चार्ज कर सकता है।

Letters of Administration क्या है?

यदि वसीयत में Executor नियुक्त नहीं है, या वह मर गया हो, तो Probate के बजाय न्यायालय Letters of Administration (LoA) जारी करता है। यह एक नया administrator नियुक्त करता है जो वसीयत के अनुसार संपत्ति बाँटेगा।

Probate कब लेना बेहतर है (भले ही अनिवार्य न हो)?

  1. जब परिवार में वसीयत की प्रामाणिकता पर विवाद हो
  2. जब कोई वारिस वसीयत को चुनौती दे सकता हो
  3. जब संपत्ति का मूल्य बहुत अधिक हो (करोड़ों में)
  4. जब कोई बैंक या हाउसिंग सोसाइटी जिद पर अड़ी हो और कानूनी विवाद से बचना हो

Probate और Succession Certificate में अंतर

पहलू Probate Succession Certificate
कब? वसीयत हो बिना वसीयत (Intestate)
क्या सिद्ध होता है? वसीयत की वैधता वारिस होने का अधिकार
संपत्ति चल और अचल दोनों मुख्यतः चल संपत्ति

Probate के बदलते नियमों को समझना जरूरी है — विशेषकर मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में संपत्ति रखने वाले परिवारों के लिए। भारत में विरासत की पूरी कानूनी प्रक्रिया को एक जगह समझने के लिए विरासत और उत्तराधिकार गाइड देखें।

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